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हिमाचल पंचायत चुनाव: अतिक्रमणकारियों पर 'प्रहार', प्रधानी की रेस से बाहर होंगे कब्जाधारी; हाई कोर्ट में अब 6 जनवरी को बड़ी सुनवाई - पढ़ें पूरी खबर

January 03, 2026 10:48 AM
Om Prakash Thakur

हिमाचल प्रदेश में पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों की रणभेरी बजने से पहले ही चुनावी बिसात पर बड़े उलटफेर शुरू हो गए हैं। एक ओर जहां प्रशासन ने सरकारी भूमि पर कुंडली मारकर बैठे 'कब्जाधारियों' के चुनाव लड़ने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाकर ग्रामीण राजनीति में शुचिता का चाबुक चलाया है, वहीं दूसरी ओर चुनावों में हो रही देरी को लेकर कानूनी जंग भी तेज हो गई है। निर्वाचन आयोग के सख्त रुख और हाई कोर्ट की दहलीज पर खड़ी याचिकाओं ने इस बार के चुनाव को 'नियम बनाम देरी' के दिलचस्प मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। पढ़ें विस्तार से..

शिमला: (HD News); हिमाचल प्रदेश में आगामी पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों को लेकर सरगर्मियां तेज हो गई हैं। शिमला जिले में चुनाव लड़ने के इच्छुक उम्मीदवारों के लिए प्रशासन ने कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिसके बाद सरकारी भूमि पर कुंडली मारकर बैठे लोगों के चुनाव लड़ने के सपनों पर पानी फिरता नजर आ रहा है। जिला निर्वाचन कार्यालय ने स्पष्ट किया है कि सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करने वाले व्यक्ति अब चुनावी रण में नहीं उतर पाएंगे।

अतिक्रमणकारियों पर गिरेगी गाज, 'रेगुलराइजेशन' का आवेदन भी बनेगा रोड़ा  - 

सहायक जिला निर्वाचन अधिकारी (पंचायत), शिमला द्वारा जारी ताजा आदेशों के अनुसार, हिमाचल प्रदेश पंचायती राज अधिनियम, 1994 की धारा 122(1)(सी) के तहत सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करने वाला कोई भी व्यक्ति अयोग्य माना जाएगा। गौर करने वाली बात यह है कि प्रशासन ने माननीय उच्च न्यायालय द्वारा 'गुरदेव बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य' मामले में दिए गए ऐतिहासिक निर्णय का हवाला देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि किसी व्यक्ति ने अतिक्रमण की गई भूमि को नियमित (Regularization) करने के लिए आवेदन भी कर रखा है, तब भी वह चुनाव लड़ने के पात्र नहीं होगा। इस सख्त रुख ने उन लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं जो कानूनी पेचों का सहारा लेकर चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे थे।

प्रशासनिक अधिकारियों को सख्ती के निर्देश -

चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता और नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने के लिए सहायक जिला निर्वाचन अधिकारी ने जिले के सभी उपमंडल अधिकारियों (SDMs), रिटर्निंग ऑफिसर्स और ब्लॉक विकास अधिकारियों को निर्देश जारी कर दिए हैं। पत्र में स्पष्ट कहा गया है कि राज्य निर्वाचन आयोग के निर्देशों और हाई कोर्ट के फैसले से सभी संबंधित अधिकारियों को अवगत कराया जाए, ताकि नामांकन के दौरान किसी भी स्तर पर चूक न हो। विभाग के इस कदम से स्पष्ट है कि इस बार पंचायत चुनाव में केवल बेदाग छवि वाले लोग ही दावेदारी पेश कर पाएंगे।

हाई कोर्ट में चुनाव की तारीखों पर रार, अब 6 जनवरी पर टिकी नजरें - 

दूसरी ओर, हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनाव की अधिसूचना में हो रही देरी का मामला अब प्रदेश के सर्वोच्च न्यायालय की दहलीज पर है। आज माननीय न्यायमूर्ति गुरमीत सिंह संधावालिया की अध्यक्षता वाली खंडपीठ के समक्ष इस मामले की सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान प्रतिवादी पक्ष ने पूर्व के कुछ फैसलों का हवाला दिया, जिसके बाद खंडपीठ ने मामले को न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति रोमेश वर्मा की अदालत में स्थानांतरित करने के निर्देश दिए। अब इस महत्वपूर्ण याचिका पर 6 जनवरी 2026 को सुनवाई होगी, जो राज्य में चुनाव की भविष्य की दिशा तय करेगी।

सरकार पर 'चुनावी विलंब' का आरोप, 31 जनवरी को खत्म हो रहा कार्यकाल - 

 अधिवक्ता  और अन्य याचिकाकर्ताओं ने प्रदेश सरकार पर पंचायत चुनाव में जानबूझकर देरी करने का गंभीर आरोप लगाया है। याचिका में तर्क दिया गया है कि वर्तमान पंचायतों का कार्यकाल 31 जनवरी 2026 को समाप्त होने जा रहा है, लेकिन नियमानुसार समय रहते अभी तक चुनाव की अधिसूचना जारी नहीं की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को समय पर पूरा करना संवैधानिक बाध्यता है, जिसमें देरी करना जनता के अधिकारों का हनन है।

इन कानूनी और प्रशासनिक हलचलों के बीच, हिमाचल की पंचायतों में चुनावी माहौल पूरी तरह गरमा चुका है। अब सबकी निगाहें 6 जनवरी को होने वाली कोर्ट की सुनवाई और निर्वाचन आयोग की अगली अधिसूचना पर टिकी हैं।

कुल मिलाकर, आगामी पंचायत चुनाव केवल नेतृत्व का चयन नहीं, बल्कि प्रशासनिक कड़ाई और कानूनी व्याख्याओं की परीक्षा भी होंगे। प्रशासन द्वारा अतिक्रमण के प्रति अपनाया गया 'जीरो टॉलरेंस' का रवैया पंचायतों में साफ-सुथरी छवि के प्रतिनिधियों को लाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। हालांकि, चुनावों की अधिसूचना में हो रही देरी ने सरकार की मंशा पर सवाल जरूर खड़े किए हैं। अब 6 जनवरी को होने वाली हाई कोर्ट की सुनवाई यह तय करेगी कि क्या प्रदेश की पंचायतों में समय पर लोकतंत्र का नया सूरज उगेगा या फिर यह कानूनी पेचों में उलझा रहेगा।

 

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