"हिमाचल प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र का आगाज संवैधानिक मर्यादाओं और संसदीय परंपराओं के बीच एक अभूतपूर्व घटनाक्रम के साथ हुआ। राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल ने अपने अभिभाषण को मात्र 2 मिनट में संक्षिप्त करते हुए स्पष्ट किया कि अभिभाषण के कुछ अंशों में संवैधानिक संस्थाओं पर की गई टिप्पणियां उनके पद की गरिमा के अनुकूल नहीं हैं। उन्होंने विवादित अंशों को पढ़ने के बजाय सदन के सदस्यों को स्वयं पढ़ने का सुझाव दिया। प्रदेश के इतिहास में यह तीसरा अवसर है जब अभिभाषण अधूरा रहा हो, जिसने सत्तापक्ष और राजभवन के बीच एक नई बहस को जन्म दे दिया है।" पढ़ें विस्तार से..
शिमला: (HD News); हिमाचल प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र का आगाज बेहद नाटकीय और ऐतिहासिक रहा। सत्र के पहले दिन राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल ने अपना अभिभाषण मात्र 2 मिनट 1 सेकेंड में समाप्त कर सदन को चौंका दिया। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू, विपक्ष के नेता जयराम ठाकुर और सत्तापक्ष व विपक्ष के तमाम विधायकों की मौजूदगी में राज्यपाल ने अभिभाषण के केवल शुरुआती दो पैराग्राफ और अंतिम अंश ही पढ़े। इसके बाद उन्होंने स्पष्ट किया कि शेष हिस्से को सदस्य स्वयं पढ़ सकते हैं, जिसके बाद सदन की कार्यवाही दोपहर 2 बजकर 45 मिनट तक के लिए स्थगित कर दी गई।

आखिर क्यों नहीं पढ़ा अभिभाषण
राज्यपाल द्वारा अभिभाषण पूरा न पढ़ने की मुख्य वजह 'राजस्व घाटा अनुदान' (RDG) से जुड़े अंशों पर उनकी आपत्ति रही। राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल ने सदन में तर्क दिया कि अभिभाषण के दस्तावेज में पेज संख्या 1 से 16 तक संस्थागत ढांचे और संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियां की गई हैं। उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि ऐसी टिप्पणियों को पढ़ना उनकी संवैधानिक मर्यादा के अनुरूप नहीं है, इसलिए उन्होंने पैरा संख्या 3 से 16 तक के हिस्से को पढ़ने से परहेज किया।
हिमाचल प्रदेश के संसदीय इतिहास में यह तीसरी बार है जब किसी राज्यपाल ने अपना अभिभाषण अधूरा छोड़ा हो। इससे पहले वर्ष 2015 में तत्कालीन राज्यपाल कल्याण सिंह ने दो राज्यों का कार्यभार होने और व्यस्तता के चलते पूरा अभिभाषण नहीं पढ़ा था। वहीं, पूर्व जयराम ठाकुर सरकार के कार्यकाल के दौरान राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय ने भी विपक्ष (तत्कालीन कांग्रेस) के भारी हंगामे और विरोध के कारण अपना अभिभाषण बीच में ही छोड़ दिया था। इस बार कारण तकनीकी या शोर-शराबा न होकर सीधे तौर पर अभिभाषण की विषय-वस्तु (कंटेंट) पर राज्यपाल की आपत्ति रही है।

"कुल मिलाकर, राज्यपाल द्वारा अभिभाषण के मुख्य अंशों को पढ़ने से इनकार करना केवल एक संसदीय घटना नहीं, बल्कि संवैधानिक मर्यादा और सरकार की अभिव्यक्ति के बीच के द्वंद्व को उजागर करता है। जहां एक ओर राज्य सरकार राजस्व घाटे जैसे गंभीर मुद्दों पर केंद्र और संस्थागत ढांचे के प्रति अपनी नाराजगी जाहिर करना चाहती थी, वहीं राज्यपाल ने स्पष्ट संदेश दिया है कि वे संवैधानिक गरिमा के विरुद्ध नहीं जाएंगे। बजट सत्र का यह तूफानी आगाज संकेत देता है कि आने वाले दिनों में सदन के भीतर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच तीखा टकराव देखने को मिल सकता है, जिसका असर प्रदेश की राजनीति पर पड़ना तय है।"

वहीं, सत्र की औपचारिक शुरुआत से पहले विधानसभा अध्यक्ष कुलदीप सिंह पठानिया की अध्यक्षता में एक सर्वदलीय बैठक भी आयोजित की गई थी। इस बैठक में संसदीय कार्य मंत्री हर्षवर्धन चौहान, उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री, कांग्रेस विधायक दल के सचेतक केवल सिंह पठानिया और विपक्ष की ओर से नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर व भाजपा सचेतक सुखराम चौधरी उपस्थित रहे। इस बैठक का उद्देश्य सत्र की कार्यवाही को सुचारू रूप से चलाना था, लेकिन राज्यपाल के इस कड़े रुख ने प्रदेश की सियासत में नई चर्चा छेड़ दी है।