राजधानी शिमला के कुसुंपटी स्थित एसबीआई (SBI) डीजीएम कार्यालय के बाहर वीरवार को अनुबंधित हाउसकीपिंग कर्मियों का गुस्सा फूट पड़ा। गैर-कानूनी तबादलों, वेतन विसंगतियों और भारी शोषण के विरोध में 'एसबीआई कॉन्ट्रैक्ट वर्करज़ यूनियन (सीटू)' ने 5 घंटे तक जोरदार प्रदर्शन किया। आक्रोशित मजदूरों ने बैंक गेट पर पहुंचकर अधिकारियों की घेराबंदी कर दी। भारी दबाव के बीच बैंक प्रबंधन को बैकफुट पर आना पड़ा और एक घंटे की मैराथन बैठक के बाद सैकड़ों कर्मचारियों के गैर-कानूनी तबादलों पर तुरंत प्रभाव से रोक लगा दी गई है। यूनियन ने साफ किया है कि अगर न्यूनतम वेतन और ईपीएफ (EPF) जैसी अन्य मांगों का स्थायी समाधान नहीं हुआ, तो पूरे प्रदेश में आंदोलन तेज किया जाएगा। पढ़ें विस्तार से.
शिमला: (HD News); राजधानी शिमला के कुसुंपटी स्थित एसबीआई (SBI) डीजीएम कार्यालय के बाहर वीरवार को अनुबंधित कर्मियों का गुस्सा फूट पड़ा। सीटू (CITU) से संबंधित 'एसबीआई कॉन्ट्रैक्ट वर्करज़ यूनियन' के बैनर तले सैंकड़ों मजदूरों ने अपनी मांगों और गैर-कानूनी तबादलों के विरोध में 5 घंटे तक जोरदार प्रदर्शन किया। हालात इतने उग्र हो गए कि आक्रोशित कर्मचारी बैंक गेट तक पहुंच गए और अधिकारियों की घेराबंदी कर दी। भारी दबाव और नारेबाजी के बाद बैकफुट पर आए बैंक प्रबंधन ने यूनियन प्रतिनिधियों के साथ एक घंटे की मैराथन बैठक की, जिसके बाद सैकड़ों कर्मचारियों के गैर-कानूनी तबादलों (Transfers) पर तुरंत प्रभाव से रोक लगा दी गई है।

शोषण की इंतहा: 11 घंटे काम, ओवरटाइम का नाम नहीं
प्रदर्शन को संबोधित करते हुए सीटू प्रदेशाध्यक्ष विजेंद्र मेहरा और अन्य यूनियन पदाधिकारियों ने बैंक प्रबंधन और ठेकेदारों की तानाशाही की पोल खोली। उन्होंने कहा कि प्रदेश की SBI शाखाओं में हाउसकीपिंग स्टाफ का भारी शारीरिक और मानसिक शोषण हो रहा है। महिला और पुरुष कर्मचारियों से सुबह 8 बजे से शाम 7 बजे तक (10 से 11 घंटे) काम लिया जा रहा है, लेकिन उन्हें कोई ओवरटाइम नहीं दिया जाता। हद तो यह है कि सफाई कर्मचारियों से उनकी तय ड्यूटी के उलट बैंक खोलने-बंद करने, वाउचर लगाने, डाक बांटने, बिल जमा करने, चाय-खाना बनाने, बर्तन धोने और यहां तक कि अटल पेंशन और जीवन ज्योति योजना के फॉर्म भरने जैसे क्लर्क व चपरासी स्तर के काम मुफ्त में करवाए जा रहे हैं।
न्यूनतम वेतन से महरूम, अपनी जेब से खरीद रहे सफाई का सामान
यूनियन नेताओं ने खुलासा किया कि इन ठेका मजदूरों को केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम वेतन तक नसीब नहीं हो रहा है। कानून के अनुसार हर महीने की 7 तारीख तक वेतन मिलना चाहिए, लेकिन कई जगह तीन-तीन महीने से वेतन लटका हुआ है। मजदूरों के ईपीएफ (EPF) में भारी धांधलियां चल रही हैं। कर्मचारियों को न तो सैलरी स्लिप दी जा रही है, न ईपीएफ स्टेटमेंट और न ही कोई पहचान पत्र। हैरानी की बात यह है कि बैंक की सफाई के लिए भी मजदूरों को हर महीने अपनी जेब से लगभग 800 रुपये का सामान खरीदना पड़ रहा है और वर्दी के पैसे भी उन्हीं के वेतन से काटे जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के 'समान कार्य-समान वेतन' के ऐतिहासिक आदेश की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।

50 की उम्र में जबरन छंटनी, बीमार होने पर भी राहत नहीं
मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा और रोजगार को पूरी तरह ताक पर रख दिया गया है। कर्मचारियों को साप्ताहिक अवकाश के अलावा कोई भी छुट्टी नहीं दी जा रही है। अगर कोई कर्मचारी छुट्टी पर जाता है, तो उसे अपनी जेब से ही 'रिलीवर' के पैसे देने पड़ते हैं। मेडिकल सुविधा के नाम पर इनके पास कुछ नहीं है। ठेकेदार की मनमानी ऐसी है कि 50 वर्ष की उम्र पार करते ही कर्मचारियों को जबरन नौकरी से निकाला जा रहा है और आवाज उठाने पर धमकियां दी जाती हैं।
आंदोलन को और तेज करने की दो टूक चेतावनी
इस विशाल राज्य स्तरीय प्रदर्शन में विजेंद्र मेहरा के साथ जिला शिमला सचिव रमाकांत मिश्रा, विवेक कश्यप, यूनियन अध्यक्षा डिम्पल, महासचिव राकेश, दलीप सिंह, पूर्ण चंद, सीताराम, विनय, सीमा, चंदेल सिंह, ममता, पूनम, सुनीता सहित कई अन्य पदाधिकारी और सैंकड़ों कार्यकर्ता मौजूद रहे। यूनियन ने प्रबंधन को दो टूक चेतावनी दी है कि गैर-कानूनी तबादलों पर रोक महज एक शुरुआत है। अगर जल्द ही वेतन, ईपीएफ, ओवरटाइम और शोषण से जुड़ी अन्य मांगों का स्थायी समाधान नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में प्रदेश भर में इस आंदोलन को और उग्र रूप दिया जाएगा।
