गंभीर आर्थिक संकट की राख से उठ रहे श्रीलंका ने अपनी राजनीतिक व्यवस्था में एक ऐसा अभूतपूर्व और ऐतिहासिक बदलाव किया है, जो दुनिया भर के लोकतंत्रों के लिए एक नजीर बन सकता है। राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके की नई वामपंथी सरकार ने देश में दशकों से हावी 'वीवीआईपी कल्चर' की जड़ें काटते हुए 49 साल पुराने संसदीय पेंशन कानून को हमेशा के लिए निरस्त कर दिया है। इसके तहत अब किसी भी श्रीलंकाई सांसद या उनकी विधवा को आजीवन पेंशन नहीं मिलेगी। सिर्फ इतना ही नहीं, सरकार ने पूर्व राष्ट्रपतियों के बंगले, महंगी गाड़ियों के काफिले और सुरक्षा जैसी तमाम शाही सुख-सुविधाओं पर भी कैंची चलाकर यह कड़ा और साफ संदेश दे दिया है कि आम जनता के टैक्स के पैसों पर अब राजनेताओं को ऐश करने का कोई विशेषाधिकार नहीं मिलेगा। पढ़ें विस्तार से -

कोलंबो: आर्थिक संकट के गहरे दौर से गुजर चुके श्रीलंका ने अब अपनी राजनीतिक व्यवस्था में एक ऐतिहासिक और कड़ा बदलाव किया है। देश की राजनीति में दशकों से जड़ें जमा चुके 'वीवीआईपी कल्चर' और राजनेताओं के विशेषाधिकारों पर सबसे बड़ा प्रहार करते हुए सरकार ने सांसदों की आजीवन पेंशन समाप्त कर दी है। राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके के नेतृत्व वाली नई वामपंथी सरकार ने अपने चुनावी वादों को हकीकत में बदलते हुए 49 साल पुराने संसदीय पेंशन अधिनियम को कूड़ेदान में डाल दिया है। इस फैसले के बाद न केवल मौजूदा और पूर्व सांसदों, बल्कि उनकी विधवाओं को मिलने वाली पेंशन भी तत्काल प्रभाव से रोक दी गई है।

संसद का कड़ा रुख और न्याय मंत्री का तीखा तंज
इस ऐतिहासिक फैसले को लागू करने के लिए सरकार ने सदन में स्पष्ट इच्छाशक्ति दिखाई। 225 सदस्यों वाली श्रीलंकाई संसद में इस बिल को भारी समर्थन मिला। सरकार ने पेंशन कानून को रद्द करने के पक्ष में 154 मत हासिल किए, जबकि इस कड़े फैसले के विरोध में केवल दो वोट पड़े। इस दौरान न्याय मंत्री हरसाना नानायक्कारा का बयान सबसे ज्यादा चर्चा में रहा, जो आम जनता की भावनाओं का सीधा प्रतिबिंब था। उन्होंने सदन के पटल पर दो टूक शब्दों में कहा, "जब देश की जनता इस सदन में होने वाली बहसों के गिरते स्तर और सांसदों के बयानों को सुनती है, तो उन्हें कतई नहीं लगता कि इन राजनेताओं को जनता की गाढ़ी कमाई से पेंशन मिलनी चाहिए।"
महिंदा राजपक्षे की जिद से शुरू हुई 'क्लीन-अप' ड्राइव
नेताओं की सुख-सुविधाओं पर कैंची चलाने की इस मुहिम की शुरुआत दरअसल पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे के एक अड़ियल रवैये के बाद हुई। सितंबर महीने में सरकार ने राजपक्षे से अपना आलीशान सरकारी बंगला खाली करने का अनुरोध किया था, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया। इसी घटना ने सरकार को पूर्व नेताओं के विशेषाधिकारों पर लगाम कसने का 'ट्रिगर' दे दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि सरकार ने एक नया विधेयक पेश कर पूर्व राष्ट्रपतियों को मिलने वाले आलीशान आवास, सरकारी ईंधन से चलने वाली महंगी गाड़ियों के काफिले, सचिवालय के कर्मचारियों की फौज और हजारों की संख्या में तैनात पर्सनल बॉडीगार्ड्स की सुविधा को तत्काल प्रभाव से छीन लिया।

आम जनता और खास माननीयों के बीच का भेदभाव खत्म
इस नए कानून ने श्रीलंका में चले आ रहे एक बहुत बड़े और चुभने वाले भेदभाव को भी समाप्त कर दिया है। 1970 के दशक से चले आ रहे पुराने कानून के मुताबिक, जहां एक आम सरकारी कर्मचारी को पेंशन का हकदार होने के लिए अपने जीवन के 10 साल देश की सेवा में देने पड़ते थे, वहीं 'माननीयों' के लिए यह नियम बेहद लचीला था। कोई भी सांसद महज 5 साल का एक कार्यकाल पूरा करते ही जीवन भर के लिए पेंशन और सुख-सुविधाओं का हकदार बन जाता था। सरकार के इस कदम ने इस असमानता को जड़ से खत्म कर दिया है।
विपक्ष की अजीबोगरीब दलील: 'पेंशन नहीं तो बढ़ेगा भ्रष्टाचार'
जहां एक ओर देश की जनता इस फैसले का स्वागत कर रही है, वहीं विपक्ष इसे नेताओं के भविष्य के लिए खतरा बता रहा है। मुख्य विपक्षी नेता सजित प्रेमदासा ने इस फैसले का कड़ा विरोध करते हुए एक अजीबोगरीब तर्क पेश किया। उनका कहना है कि अगर सांसदों को पद छोड़ने के बाद सामाजिक सुरक्षा और पेंशन नहीं मिलेगी, तो वे अपने भविष्य और रिटायरमेंट को सुरक्षित करने के लिए पद पर रहते हुए भ्रष्टाचार का सहारा लेंगे। हालांकि, सदन के भारी बहुमत ने उनके इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया।
कुल मिलाकर, श्रीलंका सरकार का यह फैसला सिर्फ सरकारी खर्च में की गई एक कटौती नहीं है, बल्कि यह आम जनता और 'खास' राजनेताओं के बीच की खाई को पाटने का एक सख्त संदेश है। विपक्ष भले ही इसे भ्रष्टाचार बढ़ने का कारण बता रहा हो, लेकिन भारी जनसमर्थन और संसदीय बहुमत ने यह साबित कर दिया है कि मुश्किल दौर से गुजर रहे देश में अब नेताओं के ऐशो-आराम के लिए कोई जगह नहीं है। श्रीलंका का यह कदम यकीनन पूरी दुनिया और खासकर दक्षिण एशियाई राजनीति के लिए एक बड़ी नजीर बन सकता है।
